महाविद्यालय पुस्तकालय
आदिकाल से शिक्षा के विविध माध्यम थे यथा – दृश्य, श्रव्य, स्मरण, वार्ता एवं लेखन । लेखन के विविध आयाम विविध चरणों को पार करते हुये पुस्तकों के रूप में प्राचीन काल से संग्रहीत एवं संरक्षित किए जाते रहे है । जो ज्ञान के साथ ही संस्कार भी प्रदान करते आ रहे है । यह आधुनिक पुस्तकालय ज्ञान का भण्डार है ।
ज्ञान एवं संस्कार एक दूसरे के पूरक हैं । ज्ञान संस्कार के साथ और संस्कार ज्ञान के साथ होने पर ही ज्ञान का वास्तविक लक्ष्य पूर्ण होता है । शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान निर्माण और ज्ञान का प्रसार परंपरागत कौशल, विचार अनुप्रयोग होता है । शिक्षा व्यक्ति के चरित्र निर्माण के साथ ही पारदर्शिता जवाबदेही एवं प्रतिस्पर्धा के लिए भी प्रेरित करता है । यह एक ऐसा स्थान है जहां रचनात्मक दिमाग एक दूसरे के साथ बातचीत करते हैं और नई वास्तविकताओं के दृष्टिकोण बनाते हैं । यह सार्वभौमिक ज्ञान प्राप्त करके अपने मिशन को पूरा करने का लगातार प्रयास करते हैं । जो केवल भौगोलिक सांस्कृतिक और राजनीतिक सीमाओं से आगे बढ़कर किया जा सकता है । ऐसा करके यह सभी संस्कृतियों को एक दूसरे को जानने की आवश्यकता की पुष्टि करता है और उनके बीच वार्ता की संभावनाओं को जीवित रखता है । ज्ञान क्षेत्र में उभरते अवसरों का पूर्ण लाभ लेने के लिए अपनी उच्च शिक्षा प्रणाली के संशोधन और पुनर्गठन की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए नई शिक्षा नीति 2020 का प्रतिपादन किया गया है । यह पुस्तके ही हमें अपने ज्ञान परम्परा को अपनी संस्कृति एवं सांस्कृतिक विरासत परम्परागत ज्ञान के साथ ही कौशलयुक्त हो आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है ।
पुस्तकालय प्रभारी – डॉ. श्वेता सिंह
पुस्तकालयाध्यक्ष – कु.रेखा देवी
महाविद्यालय पुस्तकालय कार्य दिवसों पर प्रातः 10.00 बजे से 5.00 बजे तक खुला रहता है । छात्र – छात्राओं की सुविधानुसार पुस्तकें प्राप्त करने के लिये तिथियां निर्धारित की जाती है और उन्हीं दिनों में पुस्तकें वर्ष भर निर्गत की जाती है ।
4. परीक्षा से पूर्व पुस्तकें लौटाकर अदेय प्रमाण पत्र प्राप्त करना अनिवार्य है ।